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Showing posts from January, 2026

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

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नेताजी सुभाषचंद्र बोस ~~~~~~~~~~~~ स्वतंत्रता अभियान के एक और महान क्रान्तिकारियो में सुभाष चंद्र बोस – Netaji Subhash Chandra Bose का नाम भी आता है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रिय सेना का निर्माण किया था। जो विशेषतः “आजाद हिन्द फ़ौज़” के नाम से प्रसिद्ध थी। सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद को बहुत मानते थे। “तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा” सुभाष चंद्र बोस का ये प्रसिद्ध नारा था। उन्होंने अपने स्वतंत्रता अभियान में बहोत से प्रेरणादायक भाषण दिये और भारत के लोगो को आज़ादी के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा दी। सुभाषचंद्र बोस की जीवनी ~~~~~~~~~~~~~~ पूरा नाम – सुभाषचंद्र जानकीनाथ बोस जन्म – 23 जनवरी 1897 जन्मस्थान – कटक (ओरिसा) पिता – जानकीनाथ माता – प्रभावती देवी शिक्षा – 1919 में बी.ए. 1920 में आय.सी.एस. परिक्षा उत्तीर्ण। सुभास चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। जिनकी निडर देशभक्ति ने उन्हें देश का हीरो बनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द ...

पर्वत पुत्र रमेश चंद्र गार्ग्य

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पर्वत पुत्र रमेश चंद्र गार्ग्य ~~~~~~~~~~~~~ 5 जनवरी/पुण्य-तिथि महाकवि कालिदास ने हिमालय को देवभूमि कहा है। उत्तराखंड भी हिमालय की सुरम्य शृंखलाओं में बसा एक शान्त और सुंदर प्रदेश है। गंगोत्री, यमनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ नामक चारों प्रसिद्ध धाम यहीं हैं, जिनके दर्शन कर लाखों यात्री प्रतिवर्ष अपना जीवन धन्य करते हैं। इसी उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित ग्राम चाका फलाटी, जनपद रुद्रप्रयाग में 1958 ई. (27 प्रविष्ठे ज्येष्ठ, वि.संवत 2014) में रमेश चंद्र गार्ग्य का जन्म हुआ। इनके पिता श्री वासवानंद जी गांव में खेती एवं पुरोहिताई करते थे तथा माता श्रीमती बचीदेवी धर्मपरायण महिला थीं। जब रमेश जी की अवस्था मात्र दो वर्ष की ही थी, तब उनकी माताजी का देहांत हो गया। ऐसे में उनका पालन भाभी जी ने किया। प्रारम्भिक शिक्षा गांव में पूरी कर राजकीय इंटर कॉलिज, अगस्त्य मुनि से इन्होंने कक्षा 12 की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद की शिक्षा के लिए ये  उत्तरकाशी में नौकरी कर रहे अपने बड़े भाई के पास आ गये। यहां उनका सम्पर्क संघ से हुआ और वे पढ़ाई के साथ शाखा का...

कलाकारों के कलाकार योगेन्द्र बाबा

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कलाकारों के कलाकार योगेन्द्र बाबा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 7 जनवरी/जन्म-दिवस कला की साधना अत्यन्त कठिन है। वर्षों के अभ्यास एवं परिश्रम से कोई कला सिद्ध होती है; पर कलाकारों को बटोरना उससे भी अधिक कठिन है, क्योंकि हर कलाकार के अपने नखरे रहते हैं। ‘संस्कार भारती’ के संस्थापक श्री योगेन्द्र जी ऐसे ही कलाकार हैं, जिन्होंने हजारों कला साधकों को एक माला में पिरोने का कठिन काम कर दिखाया है। 7 जनवरी, 1924 को बस्ती, उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध वकील बाबू विजय बहादुर श्रीवास्तव के घर जन्मे योगेन्द्र जी के सिर से दो वर्ष की अवस्था में ही माँ का साया उठ गया। फिर उन्हें पड़ोस के एक परिवार में बेच दिया गया। इसके पीछे यह मान्यता थी कि इससे बच्चा दीर्घायु होगा। उस पड़ोसी माँ ने ही अगले दस साल तक उन्हें पाला। वकील साहब कांग्रेस और आर्यसमाज से जुड़े थे। जब मोहल्ले में संघ की शाखा लगने लगी, तो उन्होंने योगेन्द्र को भी वहाँ जाने के लिए कहा। छात्र जीवन में उनका सम्पर्क गोरखपुर में संघ के प्रचारक नानाजी देशमुख से हुआ। योगेन्द्र जी यद्यपि सायं शाखा में जाते थे; पर नानाजी प्रतिदिन प्रातः उन्हें जगाने...

महिदपुर के सेनानी अमीन सदाशिवराव

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महिदपुर के सेनानी अमीन सदाशिवराव ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 7 जनवरी/बलिदान-दिवस 1857 का स्वाधीनता संग्राम भले ही सफल ना हुआ हो; पर उसने सिद्ध कर दिया कि देश का कोई भाग ऐसा नहीं है, जहां स्वतन्त्रता की अभिलाषा ना हो तथा लोग स्वाधीनता के लिए मर मिटने को तैयार न हों। मध्य प्रदेश में इंदौर और उसके आसपास का क्षेत्र मालवा कहलाता है। 1857 में यह पूरा क्षेत्र अंग्रेजों के विरुद्ध दहक रहा था। यहां का महिदपुर सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र था। इसलिए अंग्रेजों ने यहां छावनी की स्थापना की थी, जिसे ‘यूनाइटेड मालवा कांटिनजेंट, महिदपुर हेडक्वार्टर’ कहा जाता था।  इंदौर में नागरिकों ने जुलाई 1857 में जैसा उत्साह दिखाया था, उसका प्रभाव महिदपुर छावनी के सैनिकों पर भी साफ दिखाई देता था। वे एकांत में इस बारे में उग्र बातें करते रहते थे। यह देखकर अंग्रेजों ने बड़े अधिकारियों तथा अपने खास चमचों को सावधान कर दिया था। छावनी में भारतीय सैनिकों के कमांडर शेख रहमत उल्ला तथा उज्जैन स्थित सिंधिया के सरसूबा आपतिया की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ थी। महिदपुर के अमीन सदाशिवराव की भूमिका भी इस बा...

सीड सेवर लहरी बाई

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सीड सेवर लहरी बाई  ~~~~~~~~~~~ मध्य प्रदेश के डिंडोरी ज़िले की रहने वाली 28 वर्षीय आदिवासी बैगा किसान, लहरी बाई जी ने उस समय देसी खेती को बचाने का बीड़ा उठाया, जब आधुनिक खेती ने पारंपरिक फसलों को पीछे छोड़ दिया था। उन्होंने तय किया कि जो बीज पीढ़ियों से आदिवासी समाज की पहचान रहे हैं, उन्हें खत्म नहीं होने दिया जाएगा। इसी सोच के साथ लहरी बाई जी ने 150 से अधिक दुर्लभ और स्वदेशी मिलेट किस्मों का अपना सीड बैंक तैयार किया। इसमें कोदो, कुटकी, सांवा, रागी और ज्वार जैसे पोषक और बदलते मौसम को सहने वाले अनाज शामिल हैं, जो कभी इस इलाके की खेती की रीढ़ हुआ करते थे। लहरी बाई जी सिर्फ बीज सहेजकर नहीं रख रहीं, वे ये बीज स्थानीय किसानों में बाँटती हैं, ताकि देसी फसलों की खेती दोबारा खेतों तक लौट सके और किसान महंगे बीजों पर निर्भर ना रहें। उनके इस अहम योगदान को 2024 में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी ने ‘प्लांट जीनोम संरक्षक किसान सम्मान’ से सम्मानित किया, यह बीजों और कृषि विरासत को बचाने के लिए दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान है। इससे पहले प्रधानमंत्री श्री नरेन्द...

फॉरेस्ट मैंन "पद्मश्री” जाधव जी

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फॉरेस्ट मैंन "पद्मश्री” जाधव जी ~~~~~~~~~~~~~~~~ वर्ष 1979 में जाधव 10 वीं की परीक्षा देने के बाद ये अपने गाँव में ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़ का पानी उतरने पर इसके बरसाती भीगे रेतीले तट पर घूम रहे थे। तभी उनकी नजर लगभग 100 मृत सांपों के विशाल गुच्छे पर पड़ी। आगे बढ़ते गए तो पूरा नदी का किनारा मरे हुए जीव जन्तुओं से अटा पड़ा एक मरघट सा मिला था। मृत जानवरों के शव के कारण पैर रखने की जगह नही थी। इस दर्दनाक सामूहिक निर्दोष मौत के दृश्य ने जाधव के किशोर मन को झकझोर दिया। हज़ारो की संख्या में निर्जीव जीव जन्तुओ की निस्तेज फटी मुर्दा आँखों ने जाधव को कई रात सोने न दिया। गाँव के ही एक आदमी ने चर्चा के दौरान विचलित जाधव से कहा जब पेड़ पौधे ही नही उग रहे हैं,तो नदी के रेतीले तटों पर जानवरों को बाढ़ से बचने का आश्रय कहाँ मिले? जंगलों के बिना इन्हें भोजन कैसे मिले? बात जाधव के मन में पत्थर की लकीर बन गयी कि जानवरों को बचाने पेड़ पौधे लगाने होंगे। 50 बीज और 25 बांस के पेड़ लिए 16 साल का जाधव पहुंच गये नदी के रेतीले किनारे पर रोपने। ये आज से 35 साल पुरानी बात है।  उस दिन का दिन था और आ...

भारतीय भावनाओं के चितेरे गीतकार भरत व्यास

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भारतीय भावनाओं के चितेरे गीतकार भरत व्यास ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 6 जनवरी/जन्म-दिवस फिल्मी दुनिया में अनेक गीतकार हुए हैं, पर पंडित भरत व्यास जी को उनके भावना प्रधान गीतों के लिए याद किया जाता है। उनके 60-70 साल पुराने गीत आज भी सब आयुवर्ग वालों के मन झंकृत कर देते हैं। उनका जन्म छह जनवरी, 1917 को चुरू (राजस्थान) में हुआ था। कुछ वर्ष बाद माता-पिता के देहांत के कारण उनके दादा घनश्याम व्यास ने उनका लालन–पालन किया। चुरू, बीकानेर एवं श्रीनाथद्वारा के बाद वे आगे पढ़ने के लिए कोलकाता चले गये। कोलकाता में राजस्थान के व्यापारी बड़ी संख्या में रहते हैं। वहां पढ़ाई तथा अन्य खर्चे पूरे करने के लिए वे नाटकों के लिए कथा, संवाद, गीत आदि लिखने तथा कवि सम्मेलनों में जाने लगे। कुछ नाटकों में उन्होंने अभिनय तथा निर्देशन भी किया। उस दौरान उन्होंने वीरतापूर्ण कविता ‘केसरिया पगड़ी’ लिखी। इससे वे कोलकाता के जन-मन में छा गये। उनके लिखे नाटक ‘रंगीला मारवाड़’ ने भी भरपूर ख्याति प्राप्त की। यह कोलकाता के सबसे पुराने अल्फ्रेड थियेटर नाट्य भारती के मंच पर प्रदर्शित हुआ। इसके बाद देश में कई ज...

अमर बलिदानी महावीर सिंह जी

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अमर बलिदानी महावीर सिंह ~~~~~~~~~~~~~~~ 🌺🥀🌹🙏🌷🪷💐 तुम भूल ना जाओ उनको, इसलिए लिखी ये कहानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी... 🌺🥀🌹🙏🌷🪷💐 स्वतंत्रता सेनानी » महावीर सिंह : एक गुमनाम क्रांतिकारी जिसे इतिहास के पन्नों में दफ़न कर दिया गया। आइये परिचित होते हैं अमर बलिदानी महावीर सिंह जी से। उनका जन्म 16 सितम्बर 1904 को उत्तर प्रदेश के एटा जिले के शाहपुर टहला नामक एक छोटे से गाँव में उस क्षेत्र के प्रसिद्द वैद्य कुंवर देवी सिंह और उनकी धर्मपरायण पत्नी श्रीमती शारदा देवी के पुत्र के रूप में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा गाँव के स्कूल में ही प्राप्त करने के बाद महावीर सिंह ने हाईस्कूल की परीक्षा गवर्मेंट कालेज एटा से पास की। राष्ट्र -सम्मान के लिए मर-मिटने की शिक्षा अपने पिता से प्राप्त करने वाले महावीर सिंह में अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत की भावना बचपन से ही मौजूद थी, जिसका पता उनके बचपन में घटी एक घटना से भी मिलता है। हुआ ये कि जनवरी 1922 में एक दिन कासगंज तहसील (वर्तमान में ये अलग जिला बन गया है) के सरकारी अधिकारियों ने अपनी राजभक्ति प्रदर्शित करने के...

बाल गंगाधर तिलक जी द्वारा केसरी समाचार पत्र का प्रकाशन

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बाल गंगाधर तिलक जी द्वारा केसरी समाचार पत्र का प्रकाशन  ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 4 जनवरी / इतिहास स्मृति  लोकमान्य तिलक जी ने इंग्लिश मे मराठा व मराठी में केसरी नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किये जो जनता में बहुत ही लोकप्रिय हुए। लोकमान्य तिलक जी ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। उन्होंने माँग की कि ब्रिटिश सरकार तुरन्त भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया। केसरी (अर्थ: शेर), मराठी भाषा का एक समाचारपत्र है, जिसकी स्थापना 4 जनवरी 1881 में की थी। इस पत्र का उपयोग भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वाणी देने के लिये किया गया था। यह समाचारपत्र आज भी तिलक जी के वंशजों एवं केसरी महरट्टा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित होता है। केसरी में "देश का दुर्भाग्य" नामक शीर्षक से एक लेख छपा था, जिसमें ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध किया किया गया था I परिणाम स्वरूप बाल गंगाधर तिलक जी को 6 वर्ष के कठोर कारावास के अंतर्गत बर्मा के मांडले जेल में बंद कर दिया गया। कारावास के दौ...

प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं पत्रकार बारीन्द्र घोष जी

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प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं पत्रकार बारीन्द्र घोष ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 5 जनवरी/जन्मदिवस बारीन्द्र घोष जी का जन्म दिनांक 5 जनवरी 1880 को लंदन के पास क्रॉयडन में एक बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था, हालाँकि उनका पैतृक गाँव वर्तमान पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के कोन्नगर था। उनके पिता डॉ० कृष्णधन घोष एक चिकित्सक और जिला सर्जन थे। उनकी मां स्वर्णलता बंगाल पुनर्जागरण के भारतीय लेखक और बुद्धिजीवी श्री राजनारायण बसु की बेटी थीं । क्रांतिकारी और अध्यात्मवादी, अरबिंदो बारीन्द्रनाथ के तीसरे बड़े भाई थे। उनके दूसरे बड़े भाई, मनमोहन घोष अंग्रेजी साहित्य के विद्वान, कवि और प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता और ढाका विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। उनकी एक बड़ी बहन भी थीं जिनका नाम सरोजिनी घोष था। बारीन्द्रनाथ जी ने देवघर में स्कूल में पढ़ाई की और 1901 में प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद पटना कॉलेज में दाखिला लिया। उन्होंने बड़ौदा में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस दौरान (18वीं सदी के अंत से 19वीं सदी की शुरुआत तक) बारीन्द्र अरबिंदो जी से प्रभावित हुए और क्रांतिकारी आंदोलन की...

परमहंस योगानन्द जी

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परमहंस योगानन्द जी ~~~~~~~~~~~ 5 जनवरी/जन्मदिवस परमहंस योगानन्द जी का जन्म मुकुन्दलाल घोष के रूप में 5 जनवरी 1893 को गोरखपुर, उत्तरप्रदेश में अहीर जाति में हुआ था। योगानन्द के पिता भगवती चरण घोष बंगाल नागपुर रेलवे में उपाध्यक्ष के समकक्ष पद पर कार्यरत थे। योगानन्द जी अपने माता पिता की चौथी सन्तान थे। उनके माता पिता क्रियायोगी लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे। परमहंस योगानन्द जी बीसवीं सदी के एक आध्यात्मिक गुरू, योगी और संत थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को क्रिया योग उपदेश दिया तथा पूरे विश्व में उसका प्रचार तथा प्रसार किया। योगानंद के अनुसार क्रिया योग ईश्वर से साक्षात्कार की एक प्रभावी विधि है, जिसके पालन से अपने जीवन को संवारा और ईश्वर की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। योगानन्द जी प्रथम भारतीय गुरु थे जिन्होने अपने जीवन के कार्य को पश्चिम में किया। योगानन्द जी ने 1920 में अमेरिका के लिए प्रस्थान किया। संपूर्ण अमेरिका में उन्होंने अनेक यात्रायें की। उन्होंने अपना जीवन व्याख्यान देने, लेखन तथा निरन्तर विश्व व्यापी कार्य को दिशा देने में लगाया। उनकी उत्कृष्ट आध्यात्मिक कृति योगी कथामृत (...

हिन्दू सम्मेलन : हिन्दू समाज को जागृत करने का स्तुत्य प्रयास

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*हिन्दू सम्मेलन :  हिन्दू समाज को जागृत करने का स्तुत्य प्रयास* हिन्दूओं के जनजागरण के उपलक्ष्य में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों की एक कड़ी हिन्दू सम्मेलन है। देश भर में हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन किया जा रहा है । हिन्दू सम्मेलन आयोजित करने का मुख्य उद्देश्य हिन्दू समाज में एकता को बढ़ावा देना, सामाजिक समरसता का विकास करना, सांस्कृतिक संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाना और राष्ट्र के प्रति योगदान पर जोर देना है, जिसमें भेदभाव मिटाने, आपसी समझ बढ़ाने और सनातन संस्कृति को विश्व में एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने का स्तुत्य प्रयास है।   जैसा कि वक्ताओं के भाषणों से पता चलता है कि समाज में महत्वपूर्ण बदलाव लाने के लिए पांच परिवर्तन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है जिसमें सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन तथा नागरिक कर्तव्यों का पालन सुनिश्चित करना और स्व अर्थात् स्वदेशी की अवधारणा को मजबूत करते हुए वसुधैव कुटुंबकम अर्थात इस वसुधा पर निवास करने वाले सभी व्यक्ति एक ही कुटुंब के सदस्य हैं, इस पवित्र भावना को विकसित करना है। स्वदेशी की अवधारणा को मजबूत करने की दि...

श्री हरिबाबा जी

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श्री हरिबाबा जी ~~~~~~~~~ 4 जनवरी/पुण्य-तिथि संकीर्तन से बांध निर्माण किसी भी नदी पर बाँध बनाना सरल काम नहीं है। उसमें आधुनिक तकनीक के साथ करोड़ों रुपये और अपार मानव श्रम लगता है; पर श्री हरिबाबा जी ने केवल हरिनाम-संकीर्तन के बल पर गंगा जी पर बाँध बनाकर लाखों ग्रामवासियों के जन-धन की रक्षा की। श्री हरिबाबा जी का जन्म ग्राम मेंगखाला (होशियारपुर, पंजाब) में  फाल्गुन शुक्ल 14, वि0सम्वत् 1941 को श्री प्रतापसिंह जी के घर में हुआ था। उनका बचपन का नाम दीवान सिंह था। प्राथमिक शिक्षा के बाद उनके पिता ने उन्हें लाहौर के मैडिकल कॉलेज में भर्ती करा दिया; पर तब तक वे सांसारिक बन्धन से मुक्त होने का मन बना चुके थे। अतः वे घर छोड़कर भ्रमण में लग गये। उनके गुरु ने उन्हें दीक्षा देकर स्वतः प्रकाश नाम दिया; पर हर समय हरिनाम का संकीर्तन करते रहने के कारण वे ‘हरिबाबा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये। हरिबाबा जी को गंगा माँ से बहुत प्रेम था। उत्तर प्रदेश के अनूपशहर में वे लम्बे समय तक गंगा के तट पर रहे और वेद-वेदान्तों का गहन अध्ययन किया। उनकी ख्याति सुनकर दूर-दूर से भक्त और सन्त-महात्मा वह...

समाजसेविका सावित्री फुले जी

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सावित्रीबाई फुले  ~~~~~~~~~ नाम –सावित्रीबाई फुले जन्म – 3 जनवरी सन् 1831 मृत्यु – 10 मार्च सन् 1897 उपलब्धि – कर्मठ समाजसेवी जिन्होंने समाज के पिछड़े वर्ग खासतौर पर महिलाओं के लिए अनेक कल्याणकारी काम किये. उन्हें उनकी मराठी कविताओं के लिए भी जाना जाता है। जन्म व विवाह :- ~~~~~~~~~~ सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगाँव नामक स्थान पर 3 जनवरी सन् 1831 को हुआ। उनके पिता का नाम खण्डोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। सन् 1840 में मात्र नौ वर्ष की आयु में ही उनका विवाह बारह वर्ष के ज्योतिबा फुले से हुआ। महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले की प्रेरणा से सावित्रीबाई फुले स्वयं हुईं शिक्षित और छेड़ी महिला-शिक्षा की मुहीम :- ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ महात्मा ज्योतिबा फुले स्वयं एक महान विचारक, कार्यकर्ता, समाज सुधारक, लेखक, दार्शनिक, संपादक और क्रांतिकारी थे। सावित्रीबाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं। शादी के बाद ज्योतिबा ने ही उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया। बाद में सावित्रीबाई ने ही दलित समाज की ही नहीं, बल्कि देश की प्रथम शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त किया। उस सम...