भारतीय भावनाओं के चितेरे गीतकार भरत व्यास

भारतीय भावनाओं के चितेरे गीतकार भरत व्यास
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6 जनवरी/जन्म-दिवस

फिल्मी दुनिया में अनेक गीतकार हुए हैं, पर पंडित भरत व्यास जी को उनके भावना प्रधान गीतों के लिए याद किया जाता है। उनके 60-70 साल पुराने गीत आज भी सब आयुवर्ग वालों के मन झंकृत कर देते हैं।

उनका जन्म छह जनवरी, 1917 को चुरू (राजस्थान) में हुआ था। कुछ वर्ष बाद माता-पिता के देहांत के कारण उनके दादा घनश्याम व्यास ने उनका लालन–पालन किया।

चुरू, बीकानेर एवं श्रीनाथद्वारा के बाद वे आगे पढ़ने के लिए कोलकाता चले गये। कोलकाता में राजस्थान के व्यापारी बड़ी संख्या में रहते हैं। वहां पढ़ाई तथा अन्य खर्चे पूरे करने के लिए वे नाटकों के लिए कथा, संवाद, गीत आदि लिखने तथा कवि सम्मेलनों में जाने लगे। कुछ नाटकों में उन्होंने अभिनय तथा निर्देशन भी किया। उस दौरान उन्होंने वीरतापूर्ण कविता ‘केसरिया पगड़ी’ लिखी। इससे वे कोलकाता के जन-मन में छा गये।

उनके लिखे नाटक ‘रंगीला मारवाड़’ ने भी भरपूर ख्याति प्राप्त की। यह कोलकाता के सबसे पुराने अल्फ्रेड थियेटर नाट्य भारती के मंच पर प्रदर्शित हुआ। इसके बाद देश में कई जगह इसके प्रदर्शन हुए। फिर उन्होंने ‘रामू-चानणा तथा ‘ढोला मारू’ नाटकों की पटकथा और संवाद लिखे। इन पर आगे चलकर फिल्में भी बनीं। धीरे-धीरे उनकी ख्याति मुंबई तक जा पहुंची। अतः वे स्वयं भी वहां चले गये। यद्यपि वे निर्देशक बनना चाहते थे; पर नियति ने उन्हें गीतकार बना दिया। वहां 1943 में उन्होंने अपना पहला गीत बी.एम.व्यास की फिल्म ‘दुहाई’ के लिए लिखा था, जिसके लिए उन्हें 10 रु. पारिश्रमिक मिला।

‘रंगीला मारवाड़’ से प्रभावित होकर राजस्थान निवासी फिल्मकार ताराचंद बड़जात्या ने उन्हें अपनी फिल्म ‘चंद्रलेखा’ के गीत लिखने को कहा। इसकी सफलता ने उन्हें गीतकार के रूप में स्थापित कर दिया। वी. शांताराम जैसे कालजयी फिल्मकार ने अपनी सब फिल्मों के गीत उनसे लिखवाये। विमल राय तथा विक्रम भट्ट की अधिकांश फिल्मों के गीत भी उन्होंने ही लिखे। उन दिनों फिल्मों में उर्दू और फारसी के शब्द बहुत होते थे; पर व्यास जी ने हिन्दी शब्दों को प्रमुखता दी। उन्होंने गीतों में कई साहित्यिक प्रयोग किये, जो सफल रहे।

व्यास जी ने लगभग 125 फिल्मों में 1,200 गीत लिखे। इनमें रामराज्य, परिणीता, जनम जनम के फेरे, गूंज उठी शहनाई, दिया और तूफान, रानी रूपमती, नवरंग, दो आंखें बारह हाथ, स्त्री, संत ज्ञानेश्वर, बालक, संपूर्ण रामायण, सारंगा, प्यार की कसम, राम लक्ष्मण, नवरात्रि, बालयोगी उपमन्यु, मन की जीत, जय चित्तौड़, अंगुलीमाल, बेदर्द जमाना क्या जाने.. आदि प्रमुख हैं।

उनके अधिकांश गीतों को उस समय के सर्वश्रेष्ठ गायकों लता मंगेशकर, मन्ना डे तथा मुकेश ने स्वर दिया। उनके अमर गीतों में प्रमुख हैं - निर्बल से लड़ाई बलवान की (दिया और तूफान), ओ पवन वेग से उड़ने वाले घोड़े (जय चित्तौड़), आधा है चंद्रमा रात आधी (नवरंग), जरा सामने तो आओ छलिए (जनम जनम के फेरे), नैना हैं जादू भरे (बेदर्द जमाना क्या जाने), आ लौट के आ जा मेरे मीत (रानी रूपमती), बुद्धम् शरणम् गच्छामि (अंगुलीमाल) .. आदि। फिल्म दो आंखें बारह हाथ का गीत ‘‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम..’’ कई स्कूलों की प्रार्थना में बोला जाता है। इसकी स्वरलिपि भी उन्होंने ही बनायी थी।

फिल्म जगत में प्रसिद्धि से लोगों का दिमाग बिगड़ जाता है; पर बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यास जी यथार्थ की धरती छोड़कर दम्भ के आकाश में नहीं पहुंचे। वे कहते थे कि मेरे गीत मेरे संस्कार और भावनाओं से उपजे हैं। उनकी अंतिम फिल्म ‘कृष्णा कृष्णा’ थी, जो 1986 में प्रदर्शित हुई। यद्यपि उससे पहले चार जुलाई, 1983 को मुंबई में वे चिरनिद्रा में लीन हो गये। ‘तुम गगन के चंद्रमा हो’ उनका एक प्रसिद्ध गीत है। निःसंदेह वे फिल्म जगत के चंद्रमा ही थे।

आपके जन्मदिवस पर आपको भावभीनी श्रद्धांजलि....
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