पर्वत पुत्र रमेश चंद्र गार्ग्य
पर्वत पुत्र रमेश चंद्र गार्ग्य
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5 जनवरी/पुण्य-तिथि
महाकवि कालिदास ने हिमालय को देवभूमि कहा है। उत्तराखंड भी हिमालय की सुरम्य शृंखलाओं में बसा एक शान्त और सुंदर प्रदेश है। गंगोत्री, यमनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ नामक चारों प्रसिद्ध धाम यहीं हैं, जिनके दर्शन कर लाखों यात्री प्रतिवर्ष अपना जीवन धन्य करते हैं।
इसी उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित ग्राम चाका फलाटी, जनपद रुद्रप्रयाग में 1958 ई. (27 प्रविष्ठे ज्येष्ठ, वि.संवत 2014) में रमेश चंद्र गार्ग्य का जन्म हुआ। इनके पिता श्री वासवानंद जी गांव में खेती एवं पुरोहिताई करते थे तथा माता श्रीमती बचीदेवी धर्मपरायण महिला थीं। जब रमेश जी की अवस्था मात्र दो वर्ष की ही थी, तब उनकी माताजी का देहांत हो गया। ऐसे में उनका पालन भाभी जी ने किया।
प्रारम्भिक शिक्षा गांव में पूरी कर राजकीय इंटर कॉलिज, अगस्त्य मुनि से इन्होंने कक्षा 12 की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद की शिक्षा के लिए ये उत्तरकाशी में नौकरी कर रहे अपने बड़े भाई के पास आ गये। यहां उनका सम्पर्क संघ से हुआ और वे पढ़ाई के साथ शाखा कार्य में भी रुचि लेने लगे। कुछ समय वे यमुना घाटी के बड़कोट नगर में विस्तारक भी रहे।
इसके बाद संस्कृत से पी-एच.डी करने के लिए वे मोदीनगर आ गये। तब तक संघ के प्रति उनका प्रेम और समर्पण बहुत बढ़ चुका था। अतः पढ़ाई छोड़कर वे प्रचारक बन गये। प्रारम्भ में उन्हें वहीं गाजियाबाद तहसील प्रचारक की जिम्मेदारी दी गयी।
पहाड़ और मैदान की कार्यशैली में काफी अंतर होता है। पहाड़ में साइकिल नहीं चलती। अतः उन्होंने पहले साइकिल और फिर मोटर साइकिल चलाना सीखा। धीरे-धीरे उन्होंने कार्यकर्ताओं के हृदय में स्थान बना लिया। इससे शाखाओं का विस्तार हुआ और उनकी गुणवत्ता भी बढ़ने लगी।
इसके चार वर्ष बाद उन्हें मेरठ का जिला प्रचारक बनाया गया। मेरठ जिले में संघ का राजनीतिक रूप से बहुत विरोध होता रहा है। नये व्यक्ति को यहां की खड़ी बोली भी आसानी से समझ में नहीं आती, लेकिन सब परिस्थितियों पर विजय पाते हुए रमेश जी बहुत शीघ्र ही यहां समरस हो गये।
पर विधाता को तो कुछ और मंजूर था। पांच जनवरी, 1988 को वे मोटर साइकिल से सरधना से बड़ौत की ओर जा रहे थे। ग्राम बिनोली में सामने से एक ट्रैक्टर आ रहा था, जिसके पीछे ट्राली लगी थी। ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर धक्के खाकर अचानक ट्रैक्टर और ट्राली को जोड़ने वाली कील निकल गयी।
कील निकलते ही ट्राली ने अपनी दिशा बदल ली और वह सीधे रमेश जी से आ टकराई। यह सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि उन्हें संभलने और मोटर साइकिल को किनारे करने का अवसर ही नहीं मिला। आमने-सामने की यह टक्कर इतनी भीषण थी कि रमेश जी का वहीं प्राणान्त हो गया।
दुर्घटना होते ही आसपास लोग जुट गये, पर वहां कोई उन्हें पहचानता नहीं था। लोगों ने उनका थैला टटोला, तो उसमें दैनिक उपयोग के सामान के साथ शाखा की खाकी निक्कर, सीटी और डायरी आदि मिली। इसके आधार पर बड़ौत और मेरठ में कुछ स्वयंसेवको को समाचार दिया गया।
रमेश जी का स्वर बहुत मधुर था। वे जितनी मस्ती से गढ़वाली गीत गाते थे, उतने ही आनंद से मेरठ की रागनी भी। वे हंसी मजाक करते हुए वातावरण को बोझिल नहीं होने देते थे। गढ़वाल से बहुत वर्ष बाद पर्वतीय मूल का कोई कार्यकर्ता प्रचारक बना था। उनसे संघ को बहुत आशाएं थीं, पर पांच जनवरी, 1988 को हुई दुर्घटना ने उन्हें सदा के लिए हमसे छीन लिया।
शत-शत नमन करूँ मैं आपको .....💐💐💐💐
🙏🙏
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