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पेशवा बाजीराव बल्लाल जी

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पेशवा बाजीराव बल्लाल जी ~~~~~~~~~~~~~~ 🚩 💐💐🙏🙏💐💐🚩 तुम भूल न जाओ उनको,  इसलिए लिखी यह कहानी.... 🚩 💐💐🙏🙏💐💐🚩 जिस व्यक्ति ने अपनी आयु के 20 वे वर्ष में पेशवाई के सूत्र संभाले हों,|| 40 वर्ष तक के कार्यकाल में 42 युद्ध लड़े हों और सभी जीते हों यानि जो सदा "अपराजेय" रहा हो,|| जिसके एक युद्ध को अमेरिका जैसा राष्ट्र अपने सैनिकों को पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ा रहा हो ..ऐसे 'परमवीर' को आप क्या कहेंगे ...? आप उसे नाम नहीं दे पाएंगे ..क्योंकि आपका उससे ज्यादा परिचय ही नहीं,|| सन 18 अगस्त सन् 1700 में जन्मे उस महान पराक्रमी पेशवा का नाम है -  " बाजीराव बल्लाल पेशवा "|| "अगर मुझे पहुँचने में देर हो गई तो इतिहास लिखेगा कि एक राजपूत ने मदद मांगी और ब्राह्मण केवल भोजन करता रहा||" ऐसा कहते हुए भोजन की थाली छोड़कर बाजीराव अपनी सेना के साथ राजा छत्रसाल की मदद को बिजली की गति से दौड़ पड़े,|| धरती के महानतम योद्धाओं में से एक, अद्वितीय, अपराजेय और अनुपम योद्धा थे पेशवा बाजीराव बल्लाल,|| छत्रपति शिवाजी महाराज का हिन्दवी स्वराज का सपना जिसे पूरा कर...

सरदार हरिसिंह नलवा

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सरदार हरि सिंह नलवा ~~~~~~~~~~~~ सरदार हरिसिंह नलवा जी महाराजा रणजीत सिंह के सेनाध्यक्ष थे। जिस एक व्यक्ति का भय पठानों और अफ़ग़ानियों के मन में, पेशावर से लेकर काबुल तक, सबसे अधिक था; उस शख्सियत का नाम जनरल हरि सिंह नलवा था। सिख फौज के सबसे बड़े जनरल हरि सिंह नलवा ने कश्मीर पर विजय प्राप्त कर अपना लोहा मनवाया। यही नहीं, काबुल पर भी सेना चढ़ाकर जीत दर्ज की। खैबर दर्रे से होने वाले इस्लामिक आक्रमणों से देश को मुक्त किया। 1831 में जमरौद की जंग में लड़ते हुए शहीद हुए। नोशेरा के युद्ध में हरि सिंह नलवा ने महाराजा रणजीत सिंह की सेना का कुशल नेतृत्व किया था। रणनीति और रणकौशल की दृष्टि से हरि सिंह नलवा की तुलना दुनिया के श्रेष्ठ सेनानायकों से की जा सकती है। जीवन परिचय ~~~~~~~~ हरि सिंह नलवा जी का जन्म 1791 में 28 अप्रैल को एक सिख परिवार, गुजरांवाला, पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम गुरदयाल सिंह और माता का नाम धर्मा कौर था। बचपन में उन्हें घर के लोग प्यार से "हरिया" कहते थे। सात वर्ष की आयु में इनके पिता का देहांत ह...

1857 क्रांति के महानायक शहीद मंगल पांडे जी

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1857 क्रांति के महानायक शहीद मंगल पांडे जी ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ क्रांतिकारी मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद ज़िले में हुआ था। इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे तथा माता का नाम श्रीमति अभय रानी था। वे कोलकाता के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में "34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री" की पैदल सेना के 1446 नम्बर के सिपाही थे। भारत की आज़ादी की पहली लड़ाई अर्थात 1857 के संग्राम की शुरुआत उन्हीं के विद्रोह से हुई थी। जन्म तारीख और जगह का विवाद ~~~~~~~~~~~~~~~~~~ कुछ् सन्दर्भों में उनका जन्मस्थल अवध की अकबरपुर तहसील के सुरहुरपुर ग्राम (अब ज़िला अम्बेडकरनगर का एक भाग) बताया गया है। इन सन्दर्भों के अनुसार फ़ैज़ाबाद के दुगावाँ-रहीमपुर के मूल निवासी पण्डित दिवाकर पाण्डेय सुरहुरपुर स्थित अपनी ससुराल में बस गये थे। कुछ अन्य स्थानों पर उनकी जन्मतिथि भी 30 जनवरी 1831 बताई गई है। इन सन्दर्भों की सत्यता के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। कैसे हुई संग्राम की शुरुआत ~~~~~~~~~~~~~~~ 1857 के संग्राम की नीव उस समय पड़ी जब सिपाहियों को 1853 में एनफील्ड पी 53 नामक बंद...

संघ प्रार्थना ⛳⛳

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🚩🚩 संघ प्राथना 🇮🇳🇮🇳  1) नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।🚩 हे प्यार करने वाली मातृभूमि ! मैं तुझे सदा (सदैव) नमस्कार करता हूँ । तूने मेरा सुख से पालन-पोषण किया है ।🚩 2) महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे, पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते।। १।।🚩 हे महामंगलमयी पुण्यभूमि ! तेरे ही कार्य में मेरा यह शरीर अर्पण हो । मैं तुझे बारम्बार नमस्कार करता हूँ ।🚩 3) प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता, इमे सादरं त्वाम नमामो वयम् त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं, शुभामाशिषम देहि तत्पूर्तये।🚩 हे सर्वशक्तिशाली परमेश्वर ! हम हिन्दूराष्ट्र के सुपुत्र तुझे आदर सहित प्रणाम करते हैं। तेरे ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है । उसकी पूर्ति के लिए हमें अपना शुभाशीर्वाद दे । 🚩 4) अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम, सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्, श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं, स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।। २।।🚩 हे प्रभु ! हमें ऐसी शक्ति दे, जिसे विश्व में कभी कोई चुनौती न दे सके, ऐसा शुद्ध चारित्र्य दे जिसके समक्ष सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो जाये ऐसा ज्ञान दे कि स्वयं के...

ऑपरेशन सिंदूर

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🇮🇳 Operation Sindoor 🇮🇳 🇮🇳 Operation सिंदूर...🔴 🇮🇳 यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं था… यह भारत के सम्मान की लकीर थी… जो दुश्मन की छाती पर खींच दी गई थी। 🇮🇳🔥 जब दुश्मन ने सोचा भारत चुप रहेगा… जब उन्हें लगा कि फिर सिर्फ बयान आएंगे… तभी भारत ने जवाब दिया — खामोशी से… सटीक… और करारा। मिशन सिंदूर ने बता दिया — भारत अब सहने वाला नहीं… भारत अब चेतावनी नहीं देता… भारत सीधा हिसाब करता है। सीमा के उस पार बैठे आतंक के आकाओं को पहली बार समझ आया — भारत बदल चुका है। ये वो कहानी है… जिसे आज हम गर्व से सुनते हैं… और गर्व से सुनाते हैं... और आने वाले सालों में अगर इस पर कोई फिल्म बनेगी… तो कुछ लोग कहेंगे — "ये तो प्रोपेगेंडा है" लेकिन सच ये है — जब इतिहास में भारत का साहस लिखा जाता है, तो कमजोर दिल वालों को वो हमेशा "प्रोपेगेंडा" ही लगता है। मिशन सिंदूर ने दुनिया को दिखा दिया — भारत शांति चाहता है… लेकिन अगर कोई सिंदूर मिटाने की कोशिश करेगा… तो भारत दुश्मन का अस्तित्व मिटा देगा। 🔥 🇮🇳 भारत के वीरों को प्रणाम 🇮🇳 🇮🇳 देश के सम्मान को ...

फील्ड मार्शल मानेकशा जी

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फील्ड मार्शल मानेकशा जी  ~~~~~~~~~~~~~~ 3 अप्रैल/जन्म-दिवस 20वीं शती के प्रख्यात सेनापति फील्ड मार्शल सैमजी होरमुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशा का जन्म 3 अपै्रल 1914 को एक पारसी परिवार में अमृतसर में हुआ था। उनके पिता जी वहां चिकित्सक थे। पारसी परम्परा में अपने नाम के बाद पिता, दादा और परदादा का नाम भी जोड़ा जाता है; पर वे अपने मित्रों में अंत तक सैम बहादुर के नाम से प्रसिद्ध रहे। सैम मानेकशा का सपना बचपन से ही सेना में जाने का था। 1942 में उन्होंने मेजर के नाते द्वितीय विश्व युद्ध में गोरखा रेजिमेंट के साथ बर्मा के मोर्चे पर जापान के विरुद्ध युद्ध किया। वहां उनके पेट और फेफड़ों में मशीनगन की नौ गोलियां लगीं। शत्रु ने उन्हें मृत समझ लिया; पर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर वे बच गये। इतना ही नहीं, वह मोर्चा भी उन्होंने जीत लिया। उनकी इस वीरता पर शासन ने उन्हें ‘मिलट्री क्रास’ से सम्मानित किया। 1971 में पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचारों के कारण पूर्वी पाकिस्तान के लोग बड़ी संख्या में भारत आ रहे थे। उनके कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव पड़ रहा था तथा वातावरण भी खराब हो र...

हंसा जीवराज मेहता जी

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हंसा जीवराज मेहता जी ~~~~~~~~~~~~~ 4 अप्रैल/पुण्यतिथि हंसा मेहता जी का जन्म 3 जुलाई 1897 को बॉम्बे राज्य (वर्तमान में गुजरात) के एक नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह मनुभाई मेहता की बेटी थी (जो तत्कालीन बड़ौदा राज्य के दीवान थे) और नंदशंकर मेहता की पोती, (जो गुजराती भाषा के पहले उपन्यास करण घेलो के लेखक थे)। उन्होंने 1918 में दर्शनशास्त्र में स्नातक किया, जिसके बाद उन्होंने इंग्लैंड में पत्रकारिता और समाजशास्त्र का अध्ययन किया। 1918 में वे सरोजिनी नायडू जी से और बाद में वह 1922 में महात्मा गांधी से मिलीं। उनकी शादी प्रख्यात चिकित्सक और प्रशासक जीवराज नारायण मेहता से हुई थी। हंसा मेहता जी ने विदेशी कपड़े और शराब बेचने वाली दुकानों के बहिष्कार का आयोजन किया, और महात्मा गांधी की सलाह पर अन्य स्वतंत्रता आंदोलन गतिविधियों में भाग लिया। यहां तक कि उन्हें 1932 में अपने पति के साथ अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर जेल तक भेज दिया था। बाद में वह बॉम्बे विधान परिषद से प्रतिनिधि चुनी गईं। स्वतंत्रता के बाद, वे उन 15 महिलाओं में शामिल थीं, जो भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने वाली घटक ...

एक भारतीय आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी जी

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एक भारतीय आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी जी ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 4 अप्रैल/जन्म-दिवस श्री माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 को ग्राम बाबई, जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में श्री नन्दलाल एवं श्रीमती सुन्दराबाई के घर में हुआ था। उन पर अपनी माँ और घर के वैष्णव वातावरण का बहुत असर था। वे बहुत बुद्धिमान भी थे। एक बार सुनने पर ही कोई पाठ उन्हें याद हो जाता था। चैदह वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया। इस समय तक वे ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से कविताएँ व नाटक लिखने लगे थे। 1906 में कांग्रेस के कोलकाता में सम्पन्न हुए अधिवेशन में माखनलाल जी ने पहली बार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के दर्शन किये। अपने तरुण साथियों के साथ उनकी सुरक्षा करते हुए वे प्रयाग तक गये। तिलक जी के माध्यम से वे क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आये। महाराष्ट्र के क्रान्तिवीर सखाराम गणेश देउस्कर से दीक्षा लेकर उन्होंने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किये। फिर उन्होंने पिस्तौल चलाना भी सीखा। इसके बाद उनका रुझान पत्रकारिता की ओर हो गया। उन्होंने अनेक हिन्दी और मराठी के पत्रों में सम्पादन एवं लेखन का कार्य किया। ...

विरांगना झलकारी बाई जी

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वीरांगना झलकारी बाई जी ~~~~~~~~~~~~~~ 🌷🌹🌺🙏🚩🙏🌹🌷 तुम भूल ना जाओ उनको, इसलिए लिखी ये कहानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी... 🌷🌹🌺🙏🚩🙏🌹🌷  "जा कर रण में ललकारी थी,  वह तो झांसी की झलकारी थी", इन्हें कहते हैं दूसरी रानी लक्ष्मीबाई.....  देश के लिए मर-मिटने वाली झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई का नाम हर किसी के दिल में बसा है। कोई अगर भुलाना भी चाहे तब भी भारत माँ की इस महान बेटी को नहीं भुला सकता। लेकिन रानी लक्ष्मी बाई के ही साथ देश की एक और बेटी थी, जिसके सर पर ना रानी का ताज था और ना ही सत्ता पर। फिर भी अपनी मिट्टी के लिए वह जी-जान से लड़ी और इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ गयी।  वह वीरांगना, जिसने ना केवल 1857 की क्रांति में भाग लिया बल्कि अपने देशवासियों और अपनी रानी की रक्षा के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की!  वो थी झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की परछाई बन अंग्रेजों से लोहा लेने वाली, वीरांगना झलकारी बाई।  झलकारी बाई का जन्म 22 नवम्बर, 1830 को ग्राम भोजला (झांसी, उ.प्र.) में हुआ था। उसके पिता मूलचन्द्र जी सेना में काम करते थे।...