सीड सेवर लहरी बाई
सीड सेवर लहरी बाई
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मध्य प्रदेश के डिंडोरी ज़िले की रहने वाली 28 वर्षीय आदिवासी बैगा किसान, लहरी बाई जी ने उस समय देसी खेती को बचाने का बीड़ा उठाया, जब आधुनिक खेती ने पारंपरिक फसलों को पीछे छोड़ दिया था।
उन्होंने तय किया कि जो बीज पीढ़ियों से आदिवासी समाज की पहचान रहे हैं, उन्हें खत्म नहीं होने दिया जाएगा। इसी सोच के साथ लहरी बाई जी ने 150 से अधिक दुर्लभ और स्वदेशी मिलेट किस्मों का अपना सीड बैंक तैयार किया।
इसमें कोदो, कुटकी, सांवा, रागी और ज्वार जैसे पोषक और बदलते मौसम को सहने वाले अनाज शामिल हैं, जो कभी इस इलाके की खेती की रीढ़ हुआ करते थे।
लहरी बाई जी सिर्फ बीज सहेजकर नहीं रख रहीं, वे ये बीज स्थानीय किसानों में बाँटती हैं, ताकि देसी फसलों की खेती दोबारा खेतों तक लौट सके और किसान महंगे बीजों पर निर्भर ना रहें।
उनके इस अहम योगदान को 2024 में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी ने ‘प्लांट जीनोम संरक्षक किसान सम्मान’ से सम्मानित किया, यह बीजों और कृषि विरासत को बचाने के लिए दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान है। इससे पहले प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भी उनकी इस पहल की सराहना कर चुके हैं। लहरी बाई जी की कहानी सिर्फ बीज बचाने की नहीं है, यह खेत, किसान और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बचाने की कहानी है।
शत–शत नमन करूं मैं आपको.....
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