नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

नेताजी सुभाषचंद्र बोस
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🌺🥀🌹🙏🌷🪷💐
तुम भूल ना जाओ उनको,
इसलिए लिखी ये कहानी,
जो जिए देश खातिर उनकी,
जरा याद करो कुर्बानी......
🌺🥀🌹🙏🌷🪷💐

स्वतंत्रता अभियान के एक और महान क्रान्तिकारियो में नेताजी सुभाष चंद्र बोस – Netaji Subhash Chandra Bose का नाम भी आता है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रिय सेना का निर्माण किया था। जो विशेषतः “आजाद हिन्द फ़ौज़” के नाम से प्रसिद्ध थी। सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद जी को बहुत मानते थे।

“तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूंगा”  सुभाष चंद्र बोस का ये प्रसिद्ध नारा था। उन्होंने अपने स्वतंत्रता अभियान में बहुत से प्रेरणादायक भाषण दिये और भारत के लोगो को आज़ादी के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

सुभाषचंद्र बोस की जीवनी
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पूरा नाम   – सुभाषचंद्र जानकीनाथ बोस
जन्म        – 23 जनवरी 1897
जन्मस्थान – कटक (ओरिसा)
पिता         – जानकीनाथ
माता         – प्रभावती देवी
शिक्षा        – 1919 में बी.ए. 1920 में आई.सी.एस. परिक्षा उत्तीर्ण।

सुभास चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। जिनकी निडर देशभक्ति ने उन्हें देश का हीरो बनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था। बाद में सम्माननीय नेताजी ने पहले जर्मनी की सहायता लेते हुए, जर्मनी में ही विशेष भारतीय सैनिक कार्यालय की स्थापना, बर्लिन में 1942 के प्रारम्भ में की, जिसका 1990 में भी उपयोग किया गया था। शुरू में 1920 के अंत ने बोस राष्ट्रिय युवा कांग्रेस के उग्र नेता थे एवं 1938 और 1939 को वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। लेकिन बाद में कुछ समय बाद ही 1939 में उन्हें महात्मा गांधी से विवाद के कारण अपने पद को छोडना पड़ा। लेकिन 1940 में भारत छोड़ने से पहले ही उन्हें ब्रिटिश राज ने अपने गिरफ्त में कर लिया था। अप्रैल 1941 को बोस को जर्मनी लाया गया। जहा उन्होने भारतीय स्वतंत्रता अभियान की बागडोर संभाली और भारत को आजादी दिलाने के लिये लोगो को एकजुट करने लगे और उन्हें एकता के सूत्र में बांधने लगे।

नवंबर 1941 में, जर्मन पैसो से ही उन्होंने बर्लिन में इंडिया सेंटर की स्थापना की और कुछ ही दिनों बाद फ्री इंडिया रेडियो की भी स्थापना की, जिस पर रोज़ रात को बोस अपना कार्यक्रम किया करते। तक़रीबन 3000 मजबुत स्वयं सेवी सैनिको ने इरविन रोमेल्स द्वारा हथियाए अफ्रीका कॉर्प्स को अपने कब्जे में किया। बाद में सुभाष चंद्र बोस को जर्मन से बहुत सहायता मिली और उन्होंने भारत की आजादी के लिये जर्मन जमीन का भी उपयोग किया। इसी दौरान बोस पिता भी बने, उनकी पत्नी और सहयोगी एमिली स्किनल, जिनसे वे 1934 में मिले थे और विवाह किया था, उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया।

1942 की बसंत से, जापानियों ने दक्षिणी एशिया को हथिया लिया था और वे जर्मन प्राथमिकताओं को बदलने लगे थे। बाद में भारत पर हुआ जर्मन हमला असहनीय बनता गया। इसे देखते हुए सुभाषचंद्र बोस ने दक्षिणी एशिया जाने का निर्णय लिया। अडोल्फ़ हिटलर उसी समय 1942 के अंत में बोस से मिले थे। और उन्होंने भी सुभाषचंद्र बोस को दक्षिणी एशिया जाने की सलाह दी और पनडुब्बी लेने की भी सलाह दी। बोस ने अच्छी तरह से एक्सिस ताकत को जान लिया था और खेदसूचक ढंग से वह ज्यादा देर तक नही टिक पाई।

फरवरी 1943 में सुभाषचंद्र बोस जर्मन पनडुब्बियों पर जापान पहुचें। मैडागास्कर में, उन्हें जापानीज पनडुब्बी में स्थानांतरित किया गया। जहा मई 1943 में वे जापानीज स्थान सुमात्रा में उतरे। जापानियों की सहायता से ही सुभाष चंद्र बोस ने इंडियन नेशनल आर्मी (INA) का पुनर्निर्माण किया। जिसमे ब्रिटिश इंडियन आर्मी के भारतीय सैनिक भी शामिल थे। जिन्होंने सिंगापुर युद्ध में महान कार्य किया था। इस तरह बोस के आने से मलैया और सिंगापुर में भारतीय नागरीकों की संख्या बढ़ने लगी।

सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में जापानीज भारतीय सरकार को विभिन्न क्षेत्रो में सहायता करने के लिये राजी हुए। जैसे की उन्होंने बर्मा की सहायता की थी और साथ ही जैसा साथ उन्होंने फिलीपींस और मांचुकुओ का दिया था। उन्होंने भारत की अस्थाई सरकार, जिसे बोस प्रतिपादित कर रहे थे, की स्थापना जापानीयो के साथ मिलकर अंडमान और निकोबार में की।

सुभाषचंद्र बोस अच्छी तरह से अपनी सेना का नेतृत्व कर रहे थे – उनमे काफी करिश्माई ताकत समायी थी। इसी के चलते उन्होंने प्रसिद्ध भारतीय नारे “जय हिन्द” की घोषणा की और उसे अपनी आर्मी का नारा बनाया। उनकें नेतृत्व में निर्मित "इंडियन नेशनल आर्मी" एकता और समाजसेवा की भावना से बनी थी। उनकी सेना में भेदभाव और धर्मभेद की जरा भी भावना नही थी।

आज़ाद हिन्द फ़ौज की बिग्रेड
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जर्मनी, जापान तथा उनके समर्थक देशों द्वारा 'आज़ाद हिन्द सरकार' को मान्यता प्रदान की गई। इसके पश्चात् नेताजी बोस ने सिंगापुर एवं रंगून में आज़ाद हिन्द फ़ौज का मुख्यालय बनाया। पहली बार सुभाषचन्द्र बोस द्वारा ही महात्मा गाँधी जी के लिए राष्ट्रपिता शब्द का प्रयोग किया गया। जुलाई, 1944 ई. को सुभाषचन्द्र बोस ने रेडियो पर महात्मा गाँधी जी को संबोधित करते हुए कहा "भारत की स्वाधीनता का आख़िरी युद्ध शुरू हो चुका हैं। हे राष्ट्रपिता! भारत की मुक्ति के इस पवित्र युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ चाहते हैं।"
इसके अतिरिक्त फ़ौज की बिग्रेड को नाम भी दिये गए- 'महात्मा गाँधी ब्रिगेड', 'अबुल कलाम आज़ाद ब्रिगेड', 'जवाहरलाल नेहरू ब्रिगेड' तथा 'सुभाषचन्द्र बोस ब्रिगेड'। सुभाषचन्द्र बोस ब्रिगेड के सेनापति शाहनवाज ख़ाँ थे। सुभाषचन्द्र बोस ने सैनिकों का आहवान करते हुए कहा "तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा"।

जापान की पराजय तथा बोस की मृत्यु
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फ़रवरी से जून, 1944 ई. के मध्य आज़ाद हिन्द फ़ौज की तीन ब्रिगेडों ने जापानियों के साथ मिलकर भारत की पूर्वी सीमा एवं बर्मा से युद्ध लड़ा, परन्तु दुर्भाग्यवश दूसरे विश्व युद्ध में जापान की सेनाओं के मात खाने के साथ ही आज़ाद हिन्द फ़ौज को भी पराजय का सामना करना पड़ा। आज़ाद हिन्द फ़ौज के सैनिक एवं अधिकारियों को अंग्रेज़ों ने 1945 ई. में गिरफ़्तार कर लिया। साथ ही एक हवाई दुर्घटना में सुभाषचन्द्र बोस की भी 18 अगस्त, 1945 ई. को मृत्यु हो गई। हालांकि हवाई दुर्घटना में उनकी मृत्यु अभी भी संदेह के घेरे में है। बोस की मृत्यु का किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। लोगों को लगा कि किसी दिन वे फिर सामने आ खड़े होंगे। आज इतने वर्षों बाद भी जनमानस उनकी राह देखता है।

आज़ाद हिन्द फ़ौज के गिरफ़्तार सैनिकों एवं अधिकारियों पर अंग्रेज़ सरकार ने दिल्ली के लाल क़िले में नवम्बर, 1945 ई. को मुकदमा चलाया। इस मुकदमें के मुख्य अभियुक्त कर्नल सहगल, कर्नल ढिल्लों एवं मेजर शाहवाज ख़ाँ पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया। इनके पक्ष में सर तेजबहादुर सप्रू, जवाहरलाल नेहरू, भूला भाई देसाई और के.एन. काटजू ने दलीलें दी। लेकिन फिर भी इन तीनों की फाँसी को सज़ा सुनाई गयी। इस निर्णय के ख़िलाफ़ पूरे देश में कड़ी प्रतिक्रिया हुई, नारे लगाये गये- "लाल क़िले को तोड़ दो, आज़ाद हिन्द फ़ौज को छोड़ दो।" विवश होकर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवेल ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर इनकी मृत्युदण्ड की सज़ा को माफ कर दिया।

रंगून के ‘जुबली हॉल’ में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया वह भाषण सदैव के लिए इतिहास के पत्रों में अंकित हो गया। जिसमें उन्होंने कहा था कि - “स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है। किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है।
आज़ादी को आज अपने शीश फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है। जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता देवी को भेट चढ़ा सकें।

“तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”
इस वाक्य के जवाब में नौजवानों ने कहा – “हम अपना ख़ून देंगे” उन्होंने आईएनए को ‘दिल्ली चलो’ का नारा भी दिया। सुभाष भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। वे भारत की अमूल्य निधि थे। ‘जय हिन्द’ का नारा और अभिवादन उन्हीं की देन है।

सुभाष चंद्र बोस के ये घोषवाक्य आज भी हमें रोमांचित करते है। यही एक वाक्य सिद्ध करता है कि जिस व्यक्तित्व ने इसे देश हित में सबके सामने रखा वह किस जीवट का व्यक्ति होगा।

‘इंडियन नेशनल आर्मी’ के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु पर इतने वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी रहस्य छाया हुआ है। सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु हवाई दुर्घटना में मानी जाती है। समय गुजरने के साथ ही भारत में भी अधिकांश लोग ये मानते है कि नेताजी की मौत ताईपे में विमान हादसे में हुई।

कहा जाता है की 18 अगस्त 1945 को यह हादसा ताइवान में हुआ था। लेकिन फिर भी बहुत से लोगो को इस बात पर भरोसा नही था। ज्यादातर लोगों का मानना है कि ये हादसा अंगेजो द्वारा संचालित एक चाल थी।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस सर्वकालिक नेता थे, जिनकी ज़रूरत कल थी, आज है और आने वाले कल में भी होगी। वह ऐसे वीर सैनिक थे, इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा। उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है, जिसका वह हक़दार है। सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, मां भारती के सच्चे सपूत थे।

नेताजी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक थे। जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। उनमें नेतृत्व के चमत्कारिक गुण थे। जिनके बल पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए एक मज़बूत सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा करने में सफलता हासिल की थी।
नेताजी के जीवन से यह भी सीखने को मिलता है कि हम देश सेवा से ही जन्मदायिनी मिट्टी का कर्ज़ उतार सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के बारे में ना सोचकर पूरे देश के बारे में सोचा। नेताजी के जीवन के कई और पहलू हमे एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता थे।

उनकी बोलने की शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ चलाया। नेताजी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे। उनकी व्यापक सोच आज की राजनीति के लिए भी सोचनीय विषय है।

एक नजर में सुभाषचंद्र बोस का इतिहास :
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1) 1921 में सुभाषचंद्र बोस ने सरकारी नोकरी में बहुत उच्च स्थान का त्याग करके राष्ट्रीय स्वतंत्रता के आंदोलन में कुद पडे। स्वतंत्रता की लडाई में हिस्सा लेने के लिये अपनी नौकरी का इस्तीफा देणे वाले वो पहले आय.सी.एस. अधिकारी थे।

2) 1924 में कोलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में उनको चित्तरंजन दास ने चुना। पर इसी स्थान ना रहकर उन्होंने क्रांतिकारियों के साथ सबंध रखा, ये इल्जाम लगाकर अंग्रेजो ने उन्हें गिरफ्तार कर मंडाले के जेल में भेजा गया।

3) 1927 में सुभाषचंद्र बोस और पंडित जवाहरलाल नेहरू इन दो युवा नेताओं को कॉंग्रेस के महासचिव के रूप में चुना गया। इस चुनाव की वजह से देश के युवाओं में बड़ी चेतना बढ़ी।

4) सुभाषचंद्र बोस इन्होंने समझौते की स्वतंत्रता के अलावा पुरे स्वतंत्रता की मांग कॉंग्रेस को ब्रिटिशों से करनी चाहिये, ऐसा आग्रह किया। 1929 के लाहौर अधिवेशन में कॉंग्रेस ने पूरा स्वतंत्रता का संकल्प पारित किया। ये संकल्प पारित होने में सुभाषचंद्र बोस ने बहुत प्रयास किये थे।

5) 1938 में सुभाषचंद्र बोस हरिपुरा कॉंग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष बने।

6) 1939 में त्रिपुरा में हुये कॉंग्रेस के अधिवेशन में वो गांधी जी के उमेदवार डॉ. पट्टाभि सीतारामय्या इनको हार दिलाकर चुनकर आये। पर गांधीजी के अनुयायी उनके साथ सहकार्य नहीं करते थे। तब उन्होंने उस स्थान से इस्तीफा दिया और ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ ये नए पक्ष की स्थापन की।

7) इंग्लंड दुसरे महायुध्द में फसा हुवा है। इस स्थिति का लाभ लेकर स्वतंत्रता के लिए भारत को सशस्त्र लडाई करनी चाहिए’ ऐसा प्रचार वो करते थे। इस वजह से अंग्रेज सरकार का उनके उपर गुस्सा बढ़ा। अंगेज सरकार ने उन्हें जेल में डाला पर उनकी तबियत खराब होने के वजह से उन्हें घर पर ही नजर कैद में रखा गया। 15 जनवरी 1941 में सुभाषबाबू भेश बदलकर अग्रेजों के चंगुल से भाग गये। काबुल के रास्ते से वह जर्मनी की राजधानी बर्लिन गये।

8) भारत के स्वतंत्रता की लडाई के लिये सुभाष बाबू ने हिटलर के साथ बातचीत की। जर्मनी में ‘आजाद हिंद रेडिओ केंद्र’ शुरु किया। इस रेडियो केंद्र से अंग्रेज के विरोध में राष्ट्रव्यापी संकल्प करने का संदेश वो भारतीयों को देने लगे।

9) जर्मनी में रहकर भारतीय स्वतंत्रता के लिये हम कुछ महत्वपूर्ण रूप की कृति कर सकेंगे, ऐसा ध्यान में आते ही सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से एक पनडुब्बी से जपान गये। रासबिहारी बोस जैसे भारतीय क्रांतिकारी उस समय जपान में रहते थे। उन्होंने मलेशिया, सिंगापूर, म्यानमार आदी पूर्व आशियायी देशों के भारतीयो का ‘इंडियन इंडिपेंडेंट लीग‘ (हिंदी स्वतंत्र संघ) का स्थापन किया हुआ था। जपान के हाथ में आये हुये अंग्रेजो के लशकर में हिंदी सैनिको की ‘आजाद हिंद सेना’ उन्होंने संघटित की थी। उसका नेतृत्व स्वीकार करने के लिए सुभाष बाबू को रासबिहारी बोस ने अपना आवेदन किया। नेताजी ने वो आवेदन स्वीकार किया। इस तरह सुभाषचंद्र बोस आजाद हिंद सेना के सरसेनापती बने।

10) 1943 में अक्तुबर महीने में सुभाष बाबू की अध्यक्षता में ‘आजाद हिंद सरकार’ की स्थापना हुयी। अंडमान और निकोबार इन द्वीपों पर कब्जा करके आजाद हिंद सरकार ने वहा तिरंगा लहरा दिया। अंडमान को ‘शहीद द्वीप’ और निकोबार को ‘स्वराज्य द्वीप’ ऐसे नाम दिये। जगन्नाथराव भोसले, शहनवाज़ खान, प्रेम कुमार सहगल, डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन आदी उनके खास साथी थे। डॉ. लक्ष्मी स्वामी नाथन ये ‘झाँसी की रानी’ सेना पथक की प्रमुख थी।
‘तिरंगा झँडा’ ये आजाद हिंद सेना का निशान, ‘जय हिंद’ ये अभिवादन के शब्द, ‘चलो दिल्ली’ ये घोष वाक्य और ‘कदम कदम बढाये जा’ ये समरगीत था। इसी सेना ने 1943 से 1945 तक शक्तिशाली अंग्रेजों से युध्द किया था तथा उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर देने के विषय में सोचने को मजबूर किया।

11) जपान सरकार के निवेदन के अनुसार सुभाषचंद्र बोस एक विमान से टोकियो जाने के लिये निकले। उस विमान की फोर्मोसा मतलब ताइहोकू द्वीप के हवाई अड्डे के पास दुर्घटना हुयी। इस दुर्घटना में 18 अगस्त 1945 को नेताजी की मृत्यु हो गयी।

बचपन से ही सुभाष बाबू में राष्ट्रीयता के लक्षण प्रकट होने लगे थे और निस्वार्थ सेवा भावना, उनके चरित्र की विशेषता थी। इन सभी उदात्त प्रवुत्तियों से ही उनके क्रांतिकारी, पर उदार व्यक्तित्व का निर्माण हुआ था।

पुरस्कार :
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भारत सरकार ने 1992 में सुभाष बाबू को ‘भारतरत्न’ ये सर्वोच्च सम्मान की घोषणा की गयी लेकिन बोस परिवार वालो ने वो सम्मान स्वीकार करने से इन्कार कर दिया।

मृत्यु :
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18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में सुभाष बाबू की मौत हुयी।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते है। वे भारत की अमूल्य निधि थे। ‘जयहिन्द’ का नारा और अभिवादन उन्ही की देंन है।

उनकी प्रसिध्द पंक्तियाँ है :–

“तुम मुझे खून दो, मै तुम्हेँ आजादी दूंगा।”

शत-शत नमन करूँ मैं आपको 💐💐💐💐
🙏🙏
#VijetaMalikBJP

#HamaraAppNaMoApp 

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