बलिया बलिदान दिवस
बलिया बलिदान दिवस
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🌺🥀🌹🙏🌷🪷💐
तुम भूल ना जाओ उनको,
इसलिए लिखी ये कहानी,
जो शहीद हुए हैं उनकी,
जरा याद करो कुर्बानी...
🌺🥀🌹🙏🌷🪷💐
"जो देश अपने वीर और महान सपूतों को भूल जाता है, उस देश के आत्मसम्मान को हीनता की दीमक चट कर जाता है।" ....... याद रखना दोस्तों।
हमें समय समय पर इन महान हस्तियों को याद करते रहना चाहिए। अपने बच्चों, छोटे भाई-बहनों, आदि को इन वीर सपूतों की वीर गाथाओं को समय-समय पर सुनाना चाहिए। इन अमर बलिदानियों के किस्से-कहानियों को कॉपी-पेस्ट करके अपने-अपने सोशल नेटवर्क पर डालना चाहिए व एक दूसरे शेयर करना चाहिए , ताकि और लोगो को भी इन अमर शहीदों के बारे में पता लग सके।
'बलिया बलिदान दिवस' के पुनीत अवसर पर बागी बलिया के सभी वीर सपूतों को कोटि-कोटि नमन।
बलिया को बागी बलिया क्यो कहा जाता है
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मुस्लिम आक्रमणकारियों में सबसे पहले सन् 1194 ई0 में कुतुबुद्दीन ऐबक बलिया जिले की सरहद में कुतुबगंज घाट पर आया। सन् 1202 ई0 में इख्तियार मुहम्मद ने घाघरा नदी के तट पर स्थित कठौड़ा और कुतुबगंज के समृद्ध नगर पर अधिकार कर लिया। यहाँ यह एक उल्लेख करना उचित होगा कि बलिया जिले का एक बहुत छोटा राज्य हल्दी जिसके यशस्वी तिलकधारी राजा श्री रामदेव जी हुए, वह मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा कभी जीते नहीं जा सके।
सन् 1493 ई0 में सिकन्दर लोदी बलिया के घाघरा नदी के तट पर स्थित कठौड़ा आया था।
05 मई 1529 ई0 को बाबर और महमूद लोदी के बीच मध्ययुगीन इतिहास की पहली जल और थल पर हुई जंग का साक्षी बलिया का खरीद बना।
मुगल बादशाह औरंगजेब की मौत के बाद बलिया में राजपूत जमींदार शासन करने लगे। किन्तु सन् 1719 ई0 में जब मुहम्मद शाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा, तो उसने इन जमींदारों से जबरदस्ती लगान वसूल कराने लगा।
29 दिसम्बर 1764 ई0 को इस जिले का भू भाग भी ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के अधीन हो गया था।
उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ मण्डल का बलिया जनपद 25.33 तथा 26.11 उत्तरी अक्षांश एवं 83ः39 तथा 84ः39 पूर्वी देशान्तर पर स्थित है । इस जिले की उत्तरी सीमा सरयू नदी जिसे यहाँ घाघरा, देवहा कहा जाता है तय करती है। इस नदी के पार उत्तर दिशा में उत्तर प्रदेश का देवरिया जिले एवं बिहार के सीवान जिले की सीमा है। इसकी दक्षिण सीमा का निर्धारण गंगा नदी करती है। जिसके पार बिहार प्रांत के भोजपुर और बक्सर जिले की सीमा पड़ती है। इस जिले की पूर्वी सीमा पर घाघरा नदी की धारा गंगा में मिलती है । जो इसकी सीमा का निर्धारण करती है । इसके पूर्व में बिहार के छपरा जिले की सीमा है। पश्चिम दिशा में इस जिले की सीमा पर उत्तरप्रदेश के गाजीपुर और मऊ जिले हैं ।
यूपी के बलिया के लिए 19 अगस्त का दिन गौरवशाली है। 1942 में इसी दिन बागी बलिया के सैकड़ों क्रांतिकारियों ने अपनी शहादत देकर ब्रिटिश हुकुमत से लोहा लेते हुए जिला कारागार का दरवाजा खोल, जेल मे बंद अपने साथी क्रांतिकारियों को आजाद कराया था। बलिया 14 दिनों के लिए आजाद हुआ था। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में विद्रोही तेवरों की वजह से बलिया को बागी बलिया भी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के लिए 19 अगस्त गौरवशाली दिन है। 1942 में इसी दिन बलिया के सैकड़ों क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया था। बलिया की आजादी की गूंज लंदन तक गूंजी थी।
देश की आजादी से पांच साल पहले ही बलिया के लोगों ने 19 अगस्त 1942 को अंग्रेजी हुकूमत की जंजीर तोड़कर खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया था। खुद की शासन व्यवस्था भी लागू कर स्वतंत्र बलिया प्रजातंत्र नाम रखा और मुख्यालय हनुमानगंज कोठी में खुला। चित्तू पांडेय ने 22 अगस्त 1942 तक यहां की सरकार भी चलाई। 23 अगस्त की रात अंग्रेजों ने दोबारा यहां कब्जा कर लिया।
शेर-ए-बलिया चित्तू पांडेय के नेतृत्व में जेल में बंद सेनानियों ने फाटक तोड़कर खुद को आजाद कर जिलाधिकारी की कुर्सी पर कब्जा कर खुद को कलेक्टर नामित कर दिया था। इस लड़ाई में 84 लोग शहीद हो गए। इस आजादी की लड़ाई के बाद पूरे देश में बल मिल गया।
उक्त आजादी को पूरा जिला बलिया बलिदान दिवस के रूप में हर वर्ष 19 अगस्त को उक्त आंदोलन में जान गंवाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर मनाता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने जिला कारागार को सेनानियों की याद में संजोने का वादा किया हैं।
नौ अगस्त से भड़की चिंगारी ने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाया
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आजादी की लड़ाई के दौरान गांधी जी व अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जिला प्रशासन ने चित्तू पांडेय को साथियों जगन्नाथ सिंह और परमात्मानंद सिंह के साथ गिरफ्तार कर लिया। इससे बलिया की जनता क्षुब्ध थी। इस बीच नौ अगस्त 1942 को गांधी जी व अन्य नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस कार्यसमिति के सभी सदस्य गिरफ्तार कर अज्ञात जगह भेज दिए गए और इसी दिन से आंदोलन की चिंगारी भड़क उठी।
जिले के क्रांतिकारी हर प्रमुख स्थानों पर प्रदर्शन और हड़तालें शुरू हो गईं। तार काटने, रेल लाइन उखाड़ने, पुल तोड़ने, सड़क काटने, थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमला करके उन पर राष्ट्रीय झंडा फहराने के काम में जनता जुट गई थी। 14 अगस्त को वाराणसी कैंट से विश्वविद्यालय के छात्रों की आजाद ट्रेन बलिया स्टेशन पहुंची। इसकी खबर लगते ही सभी स्कूलों के छात्र-छात्राएं क्लास छोड़ आंदोलन में शामिल हो गये। इससे जनता में जोश की लहर दौड़ गई।
15 थानों पर एक साथ हुआ था हमला
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15 अगस्त को पांडेयपुर गांव में गुप्त बैठक हुई। उसमें यह तय हुआ कि 17 और 18 अगस्त तक तहसीलों तथा जिले के प्रमुख स्थानों पर कब्जा कर 19 अगस्त को बलिया पर हमला किया जाएगा। 17 अगस्त की सुबह रसड़ा बैरिया, गड़वार, सिकंदरपुर, हलधरपुर, नगरा, उभांव आदि स्थानों पर जनता ने धावा बोल कब्जा कर लिया। दिया। आंदोलनकारियों ने 18 अगस्त तक 15 थानों पर हमला करके आठ थानों को पूरी तरह जला दिया। कई रेलवे स्टेशन फूंके गए। सैकड़ों जगह रेल की पटरियां उखाड़ी गईं। 18 पुलिसकर्मी मारे गए। उनके हथियार छीने गए।
आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानी हुए शहीद
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बलिया जिले के सभी तहसीलों पर कब्जा करने के बाद 19 अगस्त को जनता जिला मुख्यालय बलिया पहुंची। जेल के बाहर करीब 50 हजार की संख्या में लोग हाथों में हल, मूसल, कुदाल, फावड़ा, हसुआ, गुलेल, मेटा में सांप व बिच्छू भरकर अपने नेता चित्तू पांडेय व उनके साथियों की रिहाई की मांग कर रहे थे। लोगों का हुजूम देखकर तत्कालीन जिलाधिकारी जगदीश्वर निगम व एसपी रियाजुद्दीन को मौका पर आना पड़ा और दोनों अधिकारियों ने जेल के अंदर जाकर आंदोलनकारियों से बात की। इसके बाद चित्तू पांडेय संग राधामोहन सिंह, विश्वनाथ चौबे, जगन्नाथ सिंह सहित 150 सत्याग्रहियों को रिहा कर दिया। जिले के सारे सरकारी संस्थानों पर राष्ट्रीय सरकार का पहरा बैठा दिया गया। सारे सरकारी कर्मचारी पुलिस लाइन में बंद कर दिए गए।
अगस्त क्रांति को लेकर क्रांतिकारियों के हौसले काफी बुलंद थे। क्रांतिकारियों ने रेलवे स्टेशन फूंक दिया था। रेल पटरियों को उखाड़ दी थी। 18 अगस्त 1942 से दो दिन पहले बैरिया में भूपनारायण सिंह, सुदर्शन सिंह के साथ हजारों की भीड़ के आगे थानेदार काजिम ने खुद ही थाने पर तिरंगा फहराया था और थाना खाली करने के लिए क्रांतिकारियों से दो दिन की मोहलत मांगी थी।
25 हजार से अधिक लोगों ने घेर लिया था थाना
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उसी दिन रात में थानेदार ने जिला मुख्यालय से पांच सशस्त्र पुलिसकर्मियों को बुला लिया था और रात में तिरंगे को उतारकर फेंकवा दिया। इसकी भनक लगते ही क्रांतिकारियों ने थानेदार से बदला लेने के लिए 18 अगस्त का दिन तय किया था। दोपहर होते-होते 25 हजार से अधिक लोगों ने थाने को घेर लिया।
महिलाओं की अगुवाई धनेश्वरी देवी, तेतरी देवी, राम झरिया देवी कर रही थीं। भूपनारायण सिंह, सुदर्शन सिंह, परशुराम सिंह, बलदेव सिंह, हरदेव सिंह, राजकिशोर सिंह, बैजनाथ साह, राजकुमार मिश्र आदि भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। थाने पर भीड़ को देख थानेदार ने थाने की छत पर सिपाहियों संग पहुंच कर मोर्चा संभाल लिया। इसी बीच कुछ लोग थाने में बगल से घुस गए और थाने के घोड़े को खोलकर अस्तबल ध्वस्त कर दिया। इसके बाद भीड़ थाने में घुस गई। यह देख पुलिस ने गोलियां चलाई तो क्रांतिकारियों ने पथराव कर दिया। इसी बीच कौशल कुमार सिंह छलांग लगाकर थाने की छत पर पहुंच गए और जैक उतारकर तिरंगा फहरा दिया, लेकिन पुलिस की गोली से वह शहीद हो गए। शाम तक चले इस संघर्ष में कुल 19 लोग शहीद हो गए।
18 अगस्त 1942 को बलिया के बैरिया थाना से अंग्रेजों का जैक उतार कर फेंक दिया गया था और जांबाज क्रांतिवीरों ने गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच थाने पर तिरंगा फहरा दिया था। इसमें 19 क्रांतिकारी अंग्रेजों की गोलियों से छलनी होकर शहीद हो गए और तीन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की यातना से जेल में दम तोड़ दिया था। शहीद क्रांतिकारियों की याद में प्रत्येक वर्ष शहीद स्मारक परिसर में मेला लगता है। इसमें समाजसेवी, विभिन्न राजनीतिक दल के नेता, प्रबुद्ध लोग और छात्र-छात्राएं शहीदों को नमन करते हैं।
शहीद होने वाले क्रांतिकारी
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शहीद होने वालों में कौशल सिंह के अलावा गोन्हिया छपरा निवासी निर्भय कुमार सिंह, देवबसन कोइरी, विशुनपुरा निवासी नरसिंह राय, तिवारी के मिल्की निवासी रामजनम गोंड, मिल्की मठिया के विद्यापति गोंड, चांदपुर निवासी रामप्रसाद उपाध्याय, टोलागुदरीराय निवासी मैनेजर सिंह, सोनबरसा निवासी रामदेव कुम्हार, बैरिया निवासी रामबृक्ष राय, रामनगीना सोनार, छठू कमकर, देवकी सोनार, शुभनथही निवासी धर्मदेव मिश्र, मुरारपट्टी निवासी श्रीराम तिवारी, बहुआरा निवासी मुक्तिनाथ तिवारी, श्रीपालपुर निवासी विक्रम सोनार व विक्की राम, भगवानपुर निवासी भीम अहीर शामिल थे। दयाछपरा निवासी गदाधरनाथ पांडेय, मधुबनी निवासी गौरीशंकर राय, गंगापुर निवासी रामरेखा शर्मा सहित तीन क्रांतिकारी जेल यातना में शहीद हो गए। इसके अलावा, कितने ही क्रांतिकारियों को जेल की कालकोठरी में डाल दिया गया, जिसका नाम तक कभी प्रकाश में नहीं आ सका।
'बलिया बलिदान दिवस' के पुनीत अवसर पर बागी बलिया के सभी वीर सपूतों और सभी अमर शहीदों को कोटि-कोटि नमन।
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#VijetaMalikBJP
#HamaraAppNaMoApp
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"जो देश अपने वीर और महान सपूतों को भूल जाता है, उस देश के आत्मसम्मान को हीनता की दीमक चट कर जाता है।" ....... याद रखना दोस्तों।
हमें समय समय पर इन महान हस्तियों को याद करते रहना चाहिए। अपने बच्चों, छोटे भाई-बहनों, आदि को इन वीर सपूतों की वीर गाथाओं को समय-समय पर सुनाना चाहिए। इन अमर बलिदानियों के किस्से-कहानियों को कॉपी-पेस्ट करके अपने-अपने सोशल नेटवर्क पर डालना चाहिए व एक दूसरे शेयर करना चाहिए , ताकि और लोगो को भी इन अमर शहीदों के बारे में पता लग सके।
'बलिया बलिदान दिवस' के पुनीत अवसर पर बागी बलिया के सभी वीर सपूतों को कोटि-कोटि नमन।
बलिया को बागी बलिया क्यो कहा जाता है
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मुस्लिम आक्रमणकारियों में सबसे पहले सन् 1194 ई0 में कुतुबुद्दीन ऐबक बलिया जिले की सरहद में कुतुबगंज घाट पर आया। सन् 1202 ई0 में इख्तियार मुहम्मद ने घाघरा नदी के तट पर स्थित कठौड़ा और कुतुबगंज के समृद्ध नगर पर अधिकार कर लिया। यहाँ यह एक उल्लेख करना उचित होगा कि बलिया जिले का एक बहुत छोटा राज्य हल्दी जिसके यशस्वी तिलकधारी राजा श्री रामदेव जी हुए, वह मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा कभी जीते नहीं जा सके।
सन् 1493 ई0 में सिकन्दर लोदी बलिया के घाघरा नदी के तट पर स्थित कठौड़ा आया था।
05 मई 1529 ई0 को बाबर और महमूद लोदी के बीच मध्ययुगीन इतिहास की पहली जल और थल पर हुई जंग का साक्षी बलिया का खरीद बना।
मुगल बादशाह औरंगजेब की मौत के बाद बलिया में राजपूत जमींदार शासन करने लगे। किन्तु सन् 1719 ई0 में जब मुहम्मद शाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा, तो उसने इन जमींदारों से जबरदस्ती लगान वसूल कराने लगा।
29 दिसम्बर 1764 ई0 को इस जिले का भू भाग भी ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के अधीन हो गया था।
उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ मण्डल का बलिया जनपद 25.33 तथा 26.11 उत्तरी अक्षांश एवं 83ः39 तथा 84ः39 पूर्वी देशान्तर पर स्थित है । इस जिले की उत्तरी सीमा सरयू नदी जिसे यहाँ घाघरा, देवहा कहा जाता है तय करती है। इस नदी के पार उत्तर दिशा में उत्तर प्रदेश का देवरिया जिले एवं बिहार के सीवान जिले की सीमा है। इसकी दक्षिण सीमा का निर्धारण गंगा नदी करती है। जिसके पार बिहार प्रांत के भोजपुर और बक्सर जिले की सीमा पड़ती है। इस जिले की पूर्वी सीमा पर घाघरा नदी की धारा गंगा में मिलती है । जो इसकी सीमा का निर्धारण करती है । इसके पूर्व में बिहार के छपरा जिले की सीमा है। पश्चिम दिशा में इस जिले की सीमा पर उत्तरप्रदेश के गाजीपुर और मऊ जिले हैं ।
यूपी के बलिया के लिए 19 अगस्त का दिन गौरवशाली है। 1942 में इसी दिन बागी बलिया के सैकड़ों क्रांतिकारियों ने अपनी शहादत देकर ब्रिटिश हुकुमत से लोहा लेते हुए जिला कारागार का दरवाजा खोल, जेल मे बंद अपने साथी क्रांतिकारियों को आजाद कराया था। बलिया 14 दिनों के लिए आजाद हुआ था। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में विद्रोही तेवरों की वजह से बलिया को बागी बलिया भी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के लिए 19 अगस्त गौरवशाली दिन है। 1942 में इसी दिन बलिया के सैकड़ों क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया था। बलिया की आजादी की गूंज लंदन तक गूंजी थी।
देश की आजादी से पांच साल पहले ही बलिया के लोगों ने 19 अगस्त 1942 को अंग्रेजी हुकूमत की जंजीर तोड़कर खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया था। खुद की शासन व्यवस्था भी लागू कर स्वतंत्र बलिया प्रजातंत्र नाम रखा और मुख्यालय हनुमानगंज कोठी में खुला। चित्तू पांडेय ने 22 अगस्त 1942 तक यहां की सरकार भी चलाई। 23 अगस्त की रात अंग्रेजों ने दोबारा यहां कब्जा कर लिया।
शेर-ए-बलिया चित्तू पांडेय के नेतृत्व में जेल में बंद सेनानियों ने फाटक तोड़कर खुद को आजाद कर जिलाधिकारी की कुर्सी पर कब्जा कर खुद को कलेक्टर नामित कर दिया था। इस लड़ाई में 84 लोग शहीद हो गए। इस आजादी की लड़ाई के बाद पूरे देश में बल मिल गया।
उक्त आजादी को पूरा जिला बलिया बलिदान दिवस के रूप में हर वर्ष 19 अगस्त को उक्त आंदोलन में जान गंवाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर मनाता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने जिला कारागार को सेनानियों की याद में संजोने का वादा किया हैं।
नौ अगस्त से भड़की चिंगारी ने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाया
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आजादी की लड़ाई के दौरान गांधी जी व अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जिला प्रशासन ने चित्तू पांडेय को साथियों जगन्नाथ सिंह और परमात्मानंद सिंह के साथ गिरफ्तार कर लिया। इससे बलिया की जनता क्षुब्ध थी। इस बीच नौ अगस्त 1942 को गांधी जी व अन्य नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस कार्यसमिति के सभी सदस्य गिरफ्तार कर अज्ञात जगह भेज दिए गए और इसी दिन से आंदोलन की चिंगारी भड़क उठी।
जिले के क्रांतिकारी हर प्रमुख स्थानों पर प्रदर्शन और हड़तालें शुरू हो गईं। तार काटने, रेल लाइन उखाड़ने, पुल तोड़ने, सड़क काटने, थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमला करके उन पर राष्ट्रीय झंडा फहराने के काम में जनता जुट गई थी। 14 अगस्त को वाराणसी कैंट से विश्वविद्यालय के छात्रों की आजाद ट्रेन बलिया स्टेशन पहुंची। इसकी खबर लगते ही सभी स्कूलों के छात्र-छात्राएं क्लास छोड़ आंदोलन में शामिल हो गये। इससे जनता में जोश की लहर दौड़ गई।
15 थानों पर एक साथ हुआ था हमला
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15 अगस्त को पांडेयपुर गांव में गुप्त बैठक हुई। उसमें यह तय हुआ कि 17 और 18 अगस्त तक तहसीलों तथा जिले के प्रमुख स्थानों पर कब्जा कर 19 अगस्त को बलिया पर हमला किया जाएगा। 17 अगस्त की सुबह रसड़ा बैरिया, गड़वार, सिकंदरपुर, हलधरपुर, नगरा, उभांव आदि स्थानों पर जनता ने धावा बोल कब्जा कर लिया। दिया। आंदोलनकारियों ने 18 अगस्त तक 15 थानों पर हमला करके आठ थानों को पूरी तरह जला दिया। कई रेलवे स्टेशन फूंके गए। सैकड़ों जगह रेल की पटरियां उखाड़ी गईं। 18 पुलिसकर्मी मारे गए। उनके हथियार छीने गए।
आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानी हुए शहीद
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बलिया जिले के सभी तहसीलों पर कब्जा करने के बाद 19 अगस्त को जनता जिला मुख्यालय बलिया पहुंची। जेल के बाहर करीब 50 हजार की संख्या में लोग हाथों में हल, मूसल, कुदाल, फावड़ा, हसुआ, गुलेल, मेटा में सांप व बिच्छू भरकर अपने नेता चित्तू पांडेय व उनके साथियों की रिहाई की मांग कर रहे थे। लोगों का हुजूम देखकर तत्कालीन जिलाधिकारी जगदीश्वर निगम व एसपी रियाजुद्दीन को मौका पर आना पड़ा और दोनों अधिकारियों ने जेल के अंदर जाकर आंदोलनकारियों से बात की। इसके बाद चित्तू पांडेय संग राधामोहन सिंह, विश्वनाथ चौबे, जगन्नाथ सिंह सहित 150 सत्याग्रहियों को रिहा कर दिया। जिले के सारे सरकारी संस्थानों पर राष्ट्रीय सरकार का पहरा बैठा दिया गया। सारे सरकारी कर्मचारी पुलिस लाइन में बंद कर दिए गए।
अगस्त क्रांति को लेकर क्रांतिकारियों के हौसले काफी बुलंद थे। क्रांतिकारियों ने रेलवे स्टेशन फूंक दिया था। रेल पटरियों को उखाड़ दी थी। 18 अगस्त 1942 से दो दिन पहले बैरिया में भूपनारायण सिंह, सुदर्शन सिंह के साथ हजारों की भीड़ के आगे थानेदार काजिम ने खुद ही थाने पर तिरंगा फहराया था और थाना खाली करने के लिए क्रांतिकारियों से दो दिन की मोहलत मांगी थी।
25 हजार से अधिक लोगों ने घेर लिया था थाना
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उसी दिन रात में थानेदार ने जिला मुख्यालय से पांच सशस्त्र पुलिसकर्मियों को बुला लिया था और रात में तिरंगे को उतारकर फेंकवा दिया। इसकी भनक लगते ही क्रांतिकारियों ने थानेदार से बदला लेने के लिए 18 अगस्त का दिन तय किया था। दोपहर होते-होते 25 हजार से अधिक लोगों ने थाने को घेर लिया।
महिलाओं की अगुवाई धनेश्वरी देवी, तेतरी देवी, राम झरिया देवी कर रही थीं। भूपनारायण सिंह, सुदर्शन सिंह, परशुराम सिंह, बलदेव सिंह, हरदेव सिंह, राजकिशोर सिंह, बैजनाथ साह, राजकुमार मिश्र आदि भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। थाने पर भीड़ को देख थानेदार ने थाने की छत पर सिपाहियों संग पहुंच कर मोर्चा संभाल लिया। इसी बीच कुछ लोग थाने में बगल से घुस गए और थाने के घोड़े को खोलकर अस्तबल ध्वस्त कर दिया। इसके बाद भीड़ थाने में घुस गई। यह देख पुलिस ने गोलियां चलाई तो क्रांतिकारियों ने पथराव कर दिया। इसी बीच कौशल कुमार सिंह छलांग लगाकर थाने की छत पर पहुंच गए और जैक उतारकर तिरंगा फहरा दिया, लेकिन पुलिस की गोली से वह शहीद हो गए। शाम तक चले इस संघर्ष में कुल 19 लोग शहीद हो गए।
18 अगस्त 1942 को बलिया के बैरिया थाना से अंग्रेजों का जैक उतार कर फेंक दिया गया था और जांबाज क्रांतिवीरों ने गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच थाने पर तिरंगा फहरा दिया था। इसमें 19 क्रांतिकारी अंग्रेजों की गोलियों से छलनी होकर शहीद हो गए और तीन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की यातना से जेल में दम तोड़ दिया था। शहीद क्रांतिकारियों की याद में प्रत्येक वर्ष शहीद स्मारक परिसर में मेला लगता है। इसमें समाजसेवी, विभिन्न राजनीतिक दल के नेता, प्रबुद्ध लोग और छात्र-छात्राएं शहीदों को नमन करते हैं।
शहीद होने वाले क्रांतिकारी
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शहीद होने वालों में कौशल सिंह के अलावा गोन्हिया छपरा निवासी निर्भय कुमार सिंह, देवबसन कोइरी, विशुनपुरा निवासी नरसिंह राय, तिवारी के मिल्की निवासी रामजनम गोंड, मिल्की मठिया के विद्यापति गोंड, चांदपुर निवासी रामप्रसाद उपाध्याय, टोलागुदरीराय निवासी मैनेजर सिंह, सोनबरसा निवासी रामदेव कुम्हार, बैरिया निवासी रामबृक्ष राय, रामनगीना सोनार, छठू कमकर, देवकी सोनार, शुभनथही निवासी धर्मदेव मिश्र, मुरारपट्टी निवासी श्रीराम तिवारी, बहुआरा निवासी मुक्तिनाथ तिवारी, श्रीपालपुर निवासी विक्रम सोनार व विक्की राम, भगवानपुर निवासी भीम अहीर शामिल थे। दयाछपरा निवासी गदाधरनाथ पांडेय, मधुबनी निवासी गौरीशंकर राय, गंगापुर निवासी रामरेखा शर्मा सहित तीन क्रांतिकारी जेल यातना में शहीद हो गए। इसके अलावा, कितने ही क्रांतिकारियों को जेल की कालकोठरी में डाल दिया गया, जिसका नाम तक कभी प्रकाश में नहीं आ सका।
'बलिया बलिदान दिवस' के पुनीत अवसर पर बागी बलिया के सभी वीर सपूतों और सभी अमर शहीदों को कोटि-कोटि नमन।
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