तीलू रौतेली (उत्तराखंड की रानी झांसी लक्ष्मी बाई)
रौतेली (उत्तराखंड की रानी झांसी लक्ष्मी बाई)
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उत्तराखण्ड में बचपन गुज़रा, उम्र का एक बड़ा हिस्सा हिमाचल में गुज़ारकर फिर उत्तराखण्ड लौटना हुआ और पिछले लगभग 18 वर्ष हूँ यहाँ. फिर भी हिमाचल का मोह छुड़ाए नहीं छूटता। इस बार जब मेरे सम्पूर्ण जीवन के लेखन कार्य का सरकारी लेखा-जोखा हुआ तो तीलू रौतेली का नाम सामने आया। परन्तु आम आदमी इस नाम से परिचित न हो तो कोई आश्चर्य नहीं। तीलू रौतेली नाम इतिहास से जुड़ा है। सच तो यह है कि भारत का कोई भी भूभाग ऐसा नहीं है जहाँ कोई बलिदानी न हुआ हो। आवश्यकता है तो बस उन्हें जानने-पहचानने की। हालांकि कोई भी बलिदानी यह सोचकर काम नहीं करता कि आनेवाली पीढि़याँ उसे जाने-समझें परन्तु उन बलिदानियों के कार्य ही ऐसे होते हैं कि समय की गर्द भी उनके नाम धुंधले नहीं कर सकती। ऐसा ही एक नाम उत्तराखण्ड के इतिहास में तीलू रौतेली का भी है। आइए आज इस ओजस्वी महिला के विषय में कुछ जानते हैं जो मैंने जाना-समझा। सम्भवतया विश्व में कोई दूसरा ऐसा नाम नहीं होगा जिस महिला ने 15 से 22 वर्ष की आयु तक निरंतर और अंतिम सांस तक युद्धरत रहकर अत्याचारियों के विरुद्ध संघर्ष किया हो।
इतिहास के अनुसार 9वीं शताब्दी तक कत्यूरी राजवंशीय प्रभाव कुमायूँ-गढ़वाल में चरमोत्कर्ष पर था। सन 740 से 1000 ई. तक उनकी राजधानी जोशीमठ फिर कार्तिकेयपुर, (कत्यूर) तथा बाद में बागेश्वर रही। गरुड़, बैजनाथ तथा अन्य पर्वतीय उपत्यकाओं में आज भी यत्र-तत्र बिखरे प्राचीन मन्दिर कत्यूरी राजाओं के वैभव की कहानी कहते हैं। परन्तु उत्थान के बाद पतन प्रकृति का नियम है। इसी नियम के अनुसार बाद में गढ़वाल के पाल नरेशों तथा कुमायूँ के चन्द राजाओं ने कत्यूरे मार भगाए तो वे खैरागढ़, रामगंगा आदि उपत्यकाओं एवं दक्षिणी पूर्वी गढ़वाल में गढ़ बनाकर लूटपाटकर जनता पर अत्याचार करने लगे।
तीलू रौतेली का जन्म भूप सिंह गोर्ला और मैणावती रानी के घर सन् 1661 ई. में गुराड़ गाँव में हुआ था। तीलू के पिता गंगू गोर्ला, ग्राम गुराड चौंदकोट के थोकदार थे। गंगू गोर्ला और मैणावती रानी के दो पुत्र भगतू और पर्त्वा तथा पुत्री थी तीलू।
गंगू गोर्ला महाराजा फतेहशाह (सन 1655 से 1714-15 ई.) के श्रीनगरी दरबार में सम्मानित वरिष्ठ सभासद थे। गंगू गोर्ला ने तीलू कुमारी की 15 वर्ष की उम्र में ईडा चौंदकोट के थोकदार भूम्या सिंह नेगी के पुत्र भवानी सिंह नेगी के साथ धूमधाम से सगाई कर दी। यह वही समय था जब कत्यूरी लुटेरे बनकर जनता पर अत्याचार कर रहे थे। राजा मानशाही ने गंगू गोर्ला को कत्यूरों के दमन का आदेश दिया। कत्यूरी राजा धामाशाही और खैरागढ़ के मानशााही के मध्य होने वाले संघर्ष में राजाज्ञापालन तथा गढ़वाल की रक्षा में गंगू गोर्ला, उनके दोनों वीर पुत्र, समधी भूम्या नेगी, जवांई भवानिसिंह नेगी और अन्य बहुत से शूर शिरोमणि बलिदान हो गए। अनेक वीर प्राणों की होली खेल गए परन्तु कत्यूरियों का आतंक बन्द नहीं हुआ। गढ़वाल की प्रजा हाहाकार करती घोर अन्याय सह रही थी।
काँडा के मैदान में जहाँ उसके पिता और भाइयों का वध हुआ था, तभी से प्रतिवर्ष लगनेे वाला मेला होने वाला था। किशोरी तीलू ने सखियों के साथ मेले में जाने की माता से आज्ञा माँगी तो उनकी माता ने मना कर दिया। जब तीलू ने बार-बार जिद की तो अपने परिजनों की (युद्ध में पड़ी) आहुतियों से आक्रोशित माता मैणावती ने बेटी तीलू को अन्यायी राजा धामशाही का रक्त लाने को कहा। माँ के वचनबाणों से मर्माहत तीलू ने तलवार निकालकर पिता और भाइयों का प्रतिशोध लेने का प्रण किया।
देवभूमि उत्तराखण्ड के इस कठिन परिवेश में पहाड़ों-सा दम-खम रखने वाले उन्हीें वीरों की परम्परा को कायम रखने का हौसला रखने वाली तीलू उठ खड़ी हुई। पहाड़! जहाँ आज भी जीवन उतना सरल नहीं है, वहीँ एक वीरांगना मात्र 15 वर्ष की आयु में सर हथेली पर रखकर अपने कुछ साथियों के साथ घर से निकल पड़ी। इस समय स्वामी गौरीनाथ नेे गोरिला छापामार युद्ध की रणकला तीलू को सिखाई और तीलू ने अपने साथियों के साथ इसी गोरिल्ला युद्ध के दम पर वह कत्यूरियों पर विजय प्राप्त करती आगे बढ़ती रही। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से शताब्दियों पूर्व अपनी दो सखियों बेल्लू और देवली के साथ मिलकर पुरुष वेश में बिन्दुली नाम की काली घोड़ी पर सवार होकर तीलू ने सबसे पहले खैरागढ़ को कत्यूरियों से मुक्त कराया।
यह अलग बात है कि लक्ष्मी बाई को जनमानस पहचानता है पर तीलू का इतिहात पहाड़ी मोड़ों में दबकर रह गया। खैरागढ़ से आगे बढ़कर उसने उमटागढ़ी को जीता। इसके पश्चात वह अपने दल-बल के साथ सल्ट महादेव जा पहुँची। छापामार युद्ध में पारांगत तीलू सल्ट को जीत कर भिलंग भौण की तरफ चल पड़ी परन्तु दुर्भाग्य से तीलू की दोनों अंगरक्षक सखियों को इस युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। तीलू प्रत्येक गढ़ को जीतने के बाद वहाँ की व्यवस्था अपने वफ़ादार चतुर सैनिकों के हाथों सुरक्षित करके ही आगे बढ़ रही थी चैखुटिया तक गढ़ राज्य की सीमा निर्धारित करके तीलू अपने सैनिकों के साथ देघाट वापस लौट आई। कलिंका घाट में फिर उसका शत्रुओं से सामना हुआ। यहाँ फिर भीषण संग्राम हुआ।
सराईखेत के युद्ध में तीलू ने बहुत से दिग्गज कत्यूरी योधाओं को गाजर-मूली की तरह काट डाला और अपने पिता और भाइयों की मौत का बदला लिया। यहीं पर उसकी घोड़ी बिंदुली भी शत्रुओं का शिकार हो गई। सारे दुशमन रणखेत रहे, युद्ध बन्द हो गया। जीत का बिगुल बज उठा! धकी धैं धैं धिमंडू की हुड़की बजी शत्रु का नामोनिशान ही मिट गया गढ़वाल से। कत्यूरों का आमूलचूल सफ़ाया हो गया। जो कुछ शेष रह गए वे दासत्व स्वीकार कर यहीं के नगरिक बन गए। गुरू गौरीस्वामी अंत तक परोक्ष रूप में गोरिल्ला युद्ध की चालें बता तीलू में साहस संचारित करते रहे।
इस प्रकार प्रत्येक गढ़ की जीत होती! पूर्ण विजय का शंखनाद हो गया, सर्वत्र शान्ति छा गई तो तीलू ने तथा सैनिको ने सजल नेत्रों से गुरु को भावभीनी विदाई दी। इसी समय घर लौटते हुए एक रात सोने से पहले तल्ला कांडा शिविर के निकट पूर्वी नयार नदी तट पर तीलू स्नान कर रही थी कि तभी शत्रु के एक सैनिक रामू रजवार ने धोखे से तीलू पर तलवार का वार कर दिया। घायल व निहत्थी तीलू ने संघर्ष भी किया, मगर तीलू के बलिदानी रक्त से न्यार नदी का पानी भी लाल हो गया।
नयार में तीलू की आदमकद मूर्ति आज भी उस वीरांगना की याद दिलाती है। तीलू की स्मृति में बीरोंखाल नचाया जाता है। इसमें तीलू और उसके प्रमुख सैनिक भी नचाए जाते हैं। इन्हें रणभूत कहा जाता है। ये सब के सब युद्ध नृत्य करते हैं।
‘‘अमर तीलू सिंगनी, शार्दुला धका धैं धैं।’’
शत-शत नमन करूँ मैं आपको महान वीरांगना तीलू रौतेली जी 💐💐💐💐
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